पाप क्या है पुण्य क्या है अलग-अलग धर्मों में इसकी अलग-अलग व्याख्या हो सकती है परंतु कोई भी वह कर्म या सोच जो किसी के अंदर दुख, दर्द या नाराजगी पैदा करें और आपके अंदर एक अपराध बोध की या पछतावे की भावना पैदा करें वह कर्म या सोच पाप है।
जैन धर्म में या हिंदू धर्म में अहिंसा परमो धर्म: कहा गया है। अहिंसा ही परम धर्म है। या ऐसा कह सकते हैं की हिंसा अधर्म या पाप है।
अहिंसा का मतलब है किसी को भी मन, तन, वचन, कर्म या वाणी से दुख या दर्द नहीं पहुंचना। किसी की भावनाओ को ठेस पहुंचना भी हिंसा में ही आता है। शास्त्र इससे भी आगे जाकर कहते है, अगर आप किसी का बुरा सोचते हो तो यह भी पाप ही है।
धर्म में जीव मात्र के बारे में कहा गया है। अगर आप किसी जीव को भी कस्ट पहुंचाते है तो चाहे वह कितना भी सूक्ष्म क्यों न हो, वह पाप ही है। पर इस परिभाषा से सभी धर्म सहमत नहीं हो सकते। मुस्लिम तो धरम के नाम पर बलि देते है, हिन्दू धर्म में भी बलि का प्रावधान है जैसे राजपूतों में युद्ध के समय बंगाल में काली पूजा आदि। हर धर्म में मांस खाने वाले होते है जिन पर नहीं कहा गया की ये पाप है।
समुन्द्र के किनारे रहने वाले तो आदिकाल से ही मछली खाते रहे है। धर्म स्थान देश कल के अनुसार बदलता रहता है परन्तु एक बात सभी धर्मों के अनुसार सही है, कि अगर आप के कर्मो से आप के अंदर अपराधबोध या पछतावे या ग्लानि या गलत करने कि भावना पैदा हो वह कर्म या सोच पाप है।
एक ही धर्म में अलग अलग व्यक्ति कि पाप कि परिभाषा अलग हो सकती है, जो कि उसकी परवरिश, सोच व् परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसी प्रकार हर समाज कि मान्यताये अलग अलग हो सकती है। परन्तु एक बात सब पर लागू होती है कि, अगर मनुस्य अपने स्वाभिक धर्म के अनुसार कार्य करते है तो आप को पाप नहीं लगता। भगवद्गीता में भी कहा गया है
स्वाभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम। अथार्त मनुस्य स्वाभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हूआ पाप को प्राप्त नहीं होता। क्योंकि स्वभावगत कर्म करता हूआ मनुस्य न तो अपराधबोध न ही गलानि या पछतावे से ग्रसित होता है।
इसीलिए कहा गया है तोरा मन दर्पण कहलाये, भले बुरे सारे कर्मो को देखे और दिखाए।
अंत में यदि मनुस्य अपने अंतकरण कि आवाज सुने तो वह पाप कर ही नहीं सकता।
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