सुंदरता ईश्वर की देन है। वैसे तो पृकृति की बनायीं हर चीज़ उपयोगी है और उपयोगिता ही सुंदरता है। उपयोगिता और सुंदरता एक ही सिक्के के दो पहलू है। जानवर के लिए उपयोगिता सर्वोपरि है। वह उन्ही चीज़ को जनता समझता है जो उसके लिए उपयोगी है या सुन्दर है।
प्रकृति की सार्वभौम जरूरत है इसका निरंतर चलायमान रहना और विकास करना। निरंतर विकास के लिए जो जीव पैदा हुए है उनका बने रहना और वंशवृद्धि जरूरी है। जानवर को सुंदरता की कोई पहचान नहीं होती। उनकी सुंदरता उम्र पर निर्भर करती है। जो कमउम्र है वो सुन्दर है।
पृकृति के विकास के साथ मनुस्य का जन्म हुआ और सभ्यता के विकास के साथ साथ और भावनाओं के साथ सुंदरता के भाव का भी प्रादुर्भाव हुआ। सुंदरता के पैमाने बन गए। धीरे धीरे तन की सुंदरता के साथ साथ मन की सुंदरता भी जुड़ती गयी।
कवियों ने सुंदरता का बखान किया और साइकोलॉजी ने सुंदरता के मन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा और बताया यह हमारा मनोमस्तिक पर बड़ा अच्छा प्रभाव डालता है।
गीता जी के दसवें अध्याय में कृष्ण भगवन कहते है, जो भी सुंदर हैं सर्वश्रेष्ठ है उसमे मेरा ही अंश है। ,शरीर की सुंदरता ईश्वर की देन है परन्तु मन की सुंदरता हम पैदा करते है। जैसी हमारी प्रकृति होगी, विचार होंगे वैसे ही भाव होंगे। जैसे भावों से हम निरंतर प्रभावित रहते है वैसे ही हमारे चेहरे का आकार और प्रकार हो जाता है। एक प्यार और दया से भरा व्यक्ति सूंदर लगता है और लगातार सुन्दर होता जाता है। और घृणा और द्वेष से भरा व्यक्ति असुंदर होता है और और ज्यादा असुंदर होता जाता है।
प्यार, खुशी,करुणा, छमा आदि के भाव आत्मा की सुंदरता को बढ़ाते है और यही सारे भाव भगवन को प्रिय है। अथार्त हमारे अवचेतन मन में इन भावों का बड़ा सूंदर ,अच्छा प्रभाव पड़ता है। हमारा मन मस्तिष्क और शरीर स्वस्थ रहता है। हमारा अवचेतन मन ही हमें ईश्वर से, अन्नत से जोड़ता है। अवचेतन मन ही हमारी तरक्की का आधार है; और आंतरिक सुंदरता अवचेतन की।
इसीलिए कहा है आंतरिक सुंदरता ईश्वर को पसंद है। ,